स्रोत: प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी), भारत सरकार - मत्स्यपालन, पशुपालन और डेयरी मंत्रालय · पीआईबी दिल्ली · मूल विज्ञप्ति pib.gov.in पर पढ़ें
मत्स्य पालन सब्सिडी पर डब्ल्यूटीओ समझौते के चरण 1 को मंजूरी देने का भारत का निर्णय वैश्विक मत्स्य पालन प्रशासन में एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक कदम है। 20 जुलाई, 2026 को अपना स्वीकृति पत्र जमा करके, भारत ने छोटे पैमाने और कारीगर मछुआरों को सीधे प्रभावित करने वाले मुद्दों पर अपनी नीतिगत जगह को संरक्षित करते हुए, अवैध, असूचित और अनियमित (आईयूयू) मछली पकड़ने पर अंकुश लगाने के अंतरराष्ट्रीय प्रयास के साथ खुद को जोड़ लिया है।
अनुसमर्थित चरण IUU मछली पकड़ने, अत्यधिक मछली पकड़ने वाले स्टॉक और खुले समुद्र में अनियमित मछली पकड़ने पर केंद्रित है। इसमें ईंधन, गियर, बर्फ, जहाज निर्माण और आधुनिकीकरण के लिए सब्सिडी सहित अत्यधिक क्षमता और अत्यधिक मछली पकड़ने के अधिक कठिन प्रश्नों को शामिल नहीं किया गया है। वे मुद्दे चरण 2 से संबंधित हैं, जहां भारत विकासशील देशों के लिए निष्पक्ष और विभेदित उपचार की तलाश जारी रखता है।
भारत की स्थिति सैद्धांतिक और व्यावहारिक दोनों प्रतीत होती है। यह स्थिरता उपायों का समर्थन करता है जो मछली पकड़ने के सबसे हानिकारक रूपों को लक्षित करते हैं, लेकिन यह भी जोर देते हैं कि ऐसे नियमों से तटीय समुदायों के लिए आवश्यक विकास की जगह कम नहीं होनी चाहिए जो अपनी आजीविका के लिए समुद्री मत्स्य पालन पर निर्भर हैं। भारत के लिए, चुनौती यह नहीं है कि संरक्षण का समर्थन किया जाए या नहीं, बल्कि यह कैसे सुनिश्चित किया जाए कि संरक्षण समानता की कीमत पर न हो।
यह अंतर बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के देशों और बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर-सरकारी संगठन (बीओबीपी-आईजीओ) के सदस्यों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। पूरे क्षेत्र में, मत्स्य पालन केवल एक आर्थिक गतिविधि नहीं है; वे लाखों छोटे पैमाने के मछुआरों के लिए खाद्य सुरक्षा, रोजगार और सामाजिक स्थिरता का स्रोत हैं। इसलिए सब्सिडी पर किसी भी बहुपक्षीय अनुशासन को विकासशील देशों में कारीगर और तटीय मत्स्य पालन की वास्तविकताओं को पहचानना चाहिए, जहां समर्थन का उद्देश्य अक्सर औद्योगिक विस्तार के बजाय आजीविका संरक्षण होता है।
भारत ने यह भी स्पष्ट कर दिया है कि चरण 1 के उसके अनुसमर्थन से लंबी संक्रमण अवधि और चरण 2 में अधिक लचीले उपचार की उसकी मांग कमजोर नहीं होती है। विकासशील देशों के लिए उनके विशेष आर्थिक क्षेत्रों के भीतर 25 साल की संक्रमण अवधि का आह्वान व्यापक बातचीत की स्थिति का हिस्सा बना हुआ है। इसी प्रकार भारत का भी आग्रह है कि सब्सिडी विषयों का मूल्यांकन प्रति-मछुआरे बेंचमार्क का उपयोग करके किया जाना चाहिए, न कि उन तुलनाओं के माध्यम से जो पैमाने, क्षमता और राज्य समर्थन में भारी अंतर को नजरअंदाज करती हैं।
वह भेद मायने रखता है. उन्नत मछली पकड़ने वाली अर्थव्यवस्थाओं में, क्षमता विस्तार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रभावित करने के लिए सब्सिडी का स्तर अक्सर काफी बड़ा होता है। उदाहरण के लिए, यूरोपीय संघ, अमेरिका और चीन के उन्नत औद्योगिक बेड़े में प्रति मछुआरे को वार्षिक सब्सिडी 1000 अमेरिकी डॉलर से लेकर कई हजार अमेरिकी डॉलर तक है, जबकि भारतीय छोटे पैमाने और कारीगर मछुआरों के लिए सरकारी सहायता केवल 15 अमेरिकी डॉलर प्रति मछुआरा है। भारत और विकासशील देशों में, छोटे पैमाने और कारीगर मछुआरों के लिए सीमित समर्थन आम तौर पर निर्वाह, सुरक्षा और आजीविका सुरक्षा की ओर निर्देशित होता है। दोनों को एक समान मानने से बहस विकृत हो जाएगी और तटीय राज्यों की विकासात्मक चिंताएँ कमज़ोर हो जाएँगी।
भारत द्वारा चरण 1 का अनुसमर्थन समुद्री संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध एक जिम्मेदार समुद्री राष्ट्र के रूप में इसकी विश्वसनीयता को भी मजबूत करता है। यह संकेत देता है कि भारत आईयूयू मछली पकड़ने और समुद्री संसाधनों के अनियमित दोहन के खिलाफ सार्थक कार्रवाई का समर्थन करने के लिए तैयार है। साथ ही, यह विकासशील देशों की जरूरतों के प्रति निष्पक्ष, संतुलित और संवेदनशील नियमों के लिए चरण 2 में मजबूती से बातचीत करने की भारत की क्षमता को बरकरार रखता है।
बीओबीपी-आईजीओ सदस्यों और बंगाल की खाड़ी क्षेत्र के अन्य देशों के लिए, यह क्षण मत्स्य पालन नीति को अधिक सूक्ष्म तरीके से तैयार करने का अवसर प्रदान करता है। वास्तविक कार्य एक सब्सिडी व्यवस्था का निर्माण करना है जो उन समुदायों को कमजोर किए बिना समुद्री पारिस्थितिक तंत्र की रक्षा करे जो उन पर निर्भर हैं। स्थिरता और आजीविका सुरक्षा को पूरक लक्ष्यों के रूप में देखा जाना चाहिए, न कि प्रतिस्पर्धी लक्ष्यों के रूप में।
इसलिए चरण 1 में भारत के प्रवेश को अंतिम बिंदु के रूप में नहीं, बल्कि सावधानीपूर्वक सुव्यवस्थित शुरुआत के रूप में समझा जाना चाहिए। यह वैश्विक मत्स्य पालन अनुशासन के लिए समर्थन को दर्शाता है जहां इसकी सबसे अधिक आवश्यकता है, जबकि चरण 2 में निष्पक्षता, संक्रमण और विकास के स्थान पर कठिन लेकिन अधिक महत्वपूर्ण बहस को खुला छोड़ दिया गया है।
डॉ. एम. कृष्णन पूर्व प्रधान वैज्ञानिक और प्रमुख, आईसीएआर - सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ फिशरीज एजुकेशन (सीआईएफई), मुंबई 400061 हैं और डॉ. पी. कृष्णन निदेशक, बंगाल की खाड़ी कार्यक्रम अंतर सरकारी संगठन (बीओबीपी-आईजीओ), चेन्नई हैं। व्यक्त किये गये विचार व्यक्तिगत हैं।
यह प्रेस सूचना ब्यूरो (पीआईबी) द्वारा जारी एक आधिकारिक प्रेस विज्ञप्ति है, जिसे जारी किए गए रूप में पुन: प्रस्तुत किया गया है।
