- नया उत्प्रेरक धातु-रहित कार्बनिक छिद्रयुक्त पदार्थ है, जिसका नाम टीटीटी-डीएचटीडी है
- प्रयोगशाला परीक्षण में यह व्यावसायिक प्लैटिनम उत्प्रेरकों के लगभग 96 प्रतिशत प्रदर्शन तक पहुंचा
- 120 घंटे के निरंतर संचालन के बाद भी इसका प्रदर्शन बना रहा
- यह शोध साइंस एडवांसेज पत्रिका में प्रकाशित हुआ है
- प्लैटिनम की जगह सस्ते कार्बनिक पदार्थ से जिंक-एयर सेल की लागत में भारी कमी आ सकती है
वैज्ञानिकों ने एक नया धातु-रहित उत्प्रेरक विकसित किया है, जो अगली पीढ़ी की स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों की लागत काफी घटा सकता है।
यह पदार्थ प्लैटिनम जैसा प्रदर्शन देता है, लेकिन इसमें कोई कीमती धातु इस्तेमाल नहीं होती।
ऑक्सीजन अभिक्रिया क्यों अहम है
जिंक-एयर बैटरियों में हवा से मिली ऑक्सीजन इलेक्ट्रोड के साथ अभिक्रिया करती है। इसे ऑक्सीजन अपचयन अभिक्रिया (ओआरआर) कहा जाता है।
बैटरी की दक्षता इसी अभिक्रिया की कुशलता पर काफी हद तक टिकी रहती है। जिंक-एयर बैटरियां जिंक जैसी सस्ती और अपेक्षाकृत सुरक्षित धातु पर आधारित हैं, इसलिए इन्हें आशाजनक माना जा रहा है।
इनकी रिचार्ज क्षमता, चक्र जीवन और ओआरआर की गति से जुड़ी चुनौतियां अभी बाकी हैं।
हाइड्रोजन ईंधन सेल के मुकाबले जिंक-एयर बैटरियां अधिक सरल और कॉम्पैक्ट समाधान दे सकती हैं। इन्हें उच्च-दाब हाइड्रोजन भंडारण या बड़े हाइड्रोजन ढांचे की जरूरत नहीं होती।
प्लैटिनम की जगह नया पदार्थ
कई स्वच्छ ऊर्जा तकनीकें, खासकर हाइड्रोजन ईंधन सेल, ओआरआर के लिए प्लैटिनम पर निर्भर हैं। प्लैटिनम दुनिया की सबसे दुर्लभ और महंगी धातुओं में से एक है।
इसकी ऊंची कीमत और सीमित उपलब्धता इसके बड़े पैमाने पर इस्तेमाल में बड़ी रुकावट है। इसलिए प्लैटिनम-मुक्त उत्प्रेरक खोजना जरूरी माना गया है।
विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के तहत कोलकाता के एसएन बोस राष्ट्रीय बुनियादी विज्ञान केंद्र, मोहाली के नैनो विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (आईएनएसटी) और अमरावती के एसआरएम विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं की टीम ने यह पदार्थ तैयार किया। इसे 2,4,6-ट्रिस(4-एमिनोफेनिल)-1,3,5-ट्रायज़ीन (टीटीटी) और 4,8-डाइऑक्सो-4,8-डाइहाइड्रोबेंज़ो[1,2-b:4,5-b’]डाइथियोफीन-2,6-डाइकार्बाल्डिहाइड (डीएचटीडी) लिंकर से बनाया गया है।
प्रयोग में क्या मिला
जिंक-वायु बैटरी में वायु-इलेक्ट्रोड उत्प्रेरक के रूप में इस्तेमाल होने पर यह पदार्थ प्लैटिनम जैसा प्रदर्शन कर सका।
प्रयोगशाला परीक्षणों में नए उत्प्रेरक ने व्यावसायिक प्लैटिनम उत्प्रेरकों के प्रदर्शन का लगभग 96 प्रतिशत हासिल किया। 120 घंटे के लगातार संचालन के बाद भी यह स्थिर रहा और इसका प्रदर्शन नहीं गिरा।
कार्बन, सल्फर, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन जैसे आसानी से मिलने वाले तत्वों से बनी इसकी मधुमक्खी के छत्ते जैसी छिद्रयुक्त संरचना ऑक्सीजन को कुशलता से बिजली में बदलती है।
प्रोफेसर और शोधकर्ता प्रदीप पचफुले, रामेंद्र सुंदर डे और रंजीत थापा की देखरेख में उन्नत कंप्यूटर सिमुलेशन से जांच हुई। टीम के मुताबिक, इसकी आणविक संरचना ऐसी जगहें बनाती है जहां ऑक्सीजन अणु आसानी से जुड़कर प्रतिक्रिया कर सकते हैं।
आगे की संभावना
टीम का कहना है कि प्लैटिनम की जगह सस्ते कार्बनिक पदार्थ लेने से जिंक-एयर सेल की लागत में भारी कमी आ सकती है। इससे स्वच्छ परिवहन, पोर्टेबल पावर सिस्टम और नवीकरणीय ऊर्जा भंडारण अधिक किफायती और सुलभ हो सकते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह विकास टिकाऊ सामग्री अनुसंधान में भारत के बढ़ते योगदान को भी दिखाता है।
